शिक्षिका – par excellence

ये ब्लॉग शुरू करते समय ही मैंने तय कर लिया था कि मैं हिंदी में भी लिखूंगी. सच कहूं तो लिखना मैंने हिंदी में ही शुरू किया था – वो भी स्कूल में. और मेरी प्रेरणा थीं – मेरी हिंदी शिक्षिका – श्रीमती रजनी किसान.

यूँ तो इससे पहले भी मुझे कई शिक्षक – शिक्षिकाओं ने हिंदी पढ़ाई थी, परन्तु श्रीमती किसान का अंदाज़ निराला था. पता ही नहीं चलता था कि उन्होंने कब पढ़ाया! उनके बोलने मात्र से ही सब समझ में आ जाता था. उनकी वाणी की मिठास कानों में शहद घोलती थी और दिल – दिमाग उनकी ज्ञान की बरसात में भीग कर निहाल हो जाता था. बड़े-बड़े शब्दों को वे इतनी आसानी से संधि-विच्छेद कर के समझाती थीं कि लगता ही नहीं था कि हिंदी का कोई भी शब्द, चाहे वो कितना ही बड़ा क्यों न हो, कठिन और अभेद्य हो सकता है. उन्होंने हमें ‘शुद्ध’ और ‘क्लिष्ट’ हिंदी का भेद समझाया. और तब मैंने जाना कि जो मिठास शुद्ध भाषा में है, वो बड़े बड़े शब्दों से लैस भाषा में नहीं है. आज भी मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं भाषा चाहे कोई भी बोलूँ – शुद्ध बोलूँ. इसका ये मतलब नहीं था कि वे बाकि भाषाओं से चिढती थीं या उनका तिरस्कार करती थीं. उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार एक परिवार आगे बढ़ने के लिए दूसरे परिवार की कन्या को अपने परिवार में अपना कर अपना वंश आगे बढाता है, ठीक उसी प्रकार हिंदी भाषा की उन्नति के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को अपनाना अनिवार्य है. पढ़ाते वक्त, या बात करते वक्त कभी मुहावरों का, तो कभी लोकोक्तियों का प्रयोग – आहा! कितना मधुर लगता था. किसी पाठ को समझाते समय उद्धरणों का प्रयोग – कितना विस्मित और रोमांचित करता था. आज जब मैं बात करते या पढ़ाते समय उद्धरणों या मुहावरों-लोकोक्तियों का प्रयोग करती हूँ तो उन्हें याद करती हूँ.

यकीनन वे नहीं जानती थीं कि वे मेरी प्रेरणा-स्रोत थीं. उनका सगर्व हिंदी में हस्ताक्षर करना तो मुझे इतना मोहित करता था कि मैंने भी हिंदी में हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया. अक्सर मैंने लोगों के चेहरों पर अपने हस्ताक्षर को लेकर मिश्रित भाव दखे हैं. और हर बार मैं उन्हें याद करती हूँ – उन्हें धन्यवाद देती हूँ.

जब मेरे बच्चे हुए और वो अच्छी हिंदी बोलने लगे तो मैंने उन्हें कोटि कोटि प्रणाम किया. ये उनकी ही शिक्षा थी जो फल-फूल कर मेरे सामने आई. यद्यपि मैं हिंदी की  अध्यापिका नहीं हूँ, एक बार आवश्यकता पड़ने पर जब मुझे हिंदी पढ़ाने को कहा गया तो मैं तय नहीं कर पायी कि ये मेरी हिंदी भाषा की पकड़ को सम्मानित किया जा रहा है, या उनकी शिक्षा को. मुझे संतोष व गर्व है कि मैं अपने विद्यार्थियों को हिंदी के प्रति जागरूक कर पायी.

स्कूल छोड़ने के बाद उनसे संपर्क टूट गया – पर सम्बन्ध कैसे टूट सकता है? कई बरसों के बाद facebook के ज़रिये मैं उनके बच्चों तक पहुंची. नहीं जानती कि ये मेरे लिए ख़ुशी का अवसर था कि दुःख का! जहाँ एक तरफ उनके बच्चों से संपर्क स्थापित होने की ख़ुशी थी, वहीँ ये दुखभरी खबर मिली कि अब वे हमारे बीच में नहीं हैं. शायद इश्वर को भी स्वर्ग में अच्छे शिक्षकों की ज़रुरत है.

उस महान आत्मा को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम.

4 Comments

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4 responses to “शिक्षिका – par excellence

  1. sonal adwani

    aapki tarah hum bhi bahut shikshikaaon se aise hi prabhavit hain miss..
    atyant pyaara lekh hai 🙂

  2. Pratibha Singh

    Thanks Sonal. Students like you make teaching, so enjoyable.

  3. sonal adwani

    thanks 2 u miss.. 🙂

  4. Praggya

    Pratibha di
    I know mummy was a great teacher who loved her subject immensely. Hindi literature and a graduation in classical music was a wonderful combination.
    But she was lucky to have students like you.
    Its a pleasure to get to know you.
    She would have felt so happy to meet you.
    Wish we had got in touch much earlier.
    I am sure you spread similar feeling among your student like what you carry for mummy.
    Love
    Praggya

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